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Labour Day: पसीना बहाया मजदूर ने फायदा उठाया सिस्टम ने, भारत में रुला देने वाली है मजदूरों की हालत!

Labour Day: पसीना बहाया मजदूर ने फायदा उठाया सिस्टम ने, सरकारों की लापरवाही ने मजदूर को बना दिया मजबूर!

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Labour Day: ‘मजदूर दिवस’, सुनने में लगता है जैसे बाकी खास दिनों पर लोगों को सम्मानित किया जाता है ठीक वैसे ही मजदूर दिवस पर मजदूरों को भी सम्मानित किया जाता होगा, लेकिन ऐसा बिल्कुल नहीं है. वैसे तो हर खास दिन की तरह इस दिन को मनाने के पीछे भी एक वजह और कहानी है, लेकिन वो वजह और कहानी सिर्फ पोस्टर और सोशल मीडिया पोस्ट तक ही सीमित है.

भारत में कैसे हुई ‘मजदूर दिवस’ मनाने की शुरुआत
आईए, पहले आपको इस दिन को मनाने के पीछे की कहानी बताते हैं. 1 मई, 1923 ये वो दिन था जब भारत में इस दिन को मनाने की शुरुआत हुई. भारत में पहली बार ‘मजदूर दिवस’ चेन्नई में मनाया गया. कहा जाता है कि 1 मई को मद्रास हाईकोर्ट के सामने मजदूरों के अधिकारों को लेकर एक सभा आयोजित की गई. इस सभा में मजदूरों के अधिकारों की आवाज उठाई गई और इसी के बाद से इस दिन को मनाने की शुरुआत हो गई, लेकिन अगर इस दिन के इतिहास की बात की जाए तो इसका इतिहास भारत नहीं, बल्कि शिकागो से जुड़ा है.

01 मई को शिकागो में किया गया था आंदोलन
दरअसल, शिकागो में 01 मई को एक बड़ा आंदोलन किया गया, जिसका कारण मजदूरों से उनके तय घंटों से ज्यादा समय तक काम करवाना था. कहा जाता है कि शिकागों में मजदूरों से रोजाना 15-15 घंटे काम करवाया जाता था, जिसके लिए उन्हें बहुत कम वेतन मिलता था. इससे परेशान होकर सभी मजदूर सड़कों पर उतर आए. मजदूरों ने प्रदर्शन करते हुए मांग उठाई कि उनसे दिन में केवल 8 घंटे ही काम करवाया जाए. इसके साथ ही सप्ताह में एक दिन की छुट्टी भी दी जाए.

आंदोलन में चली गई कई मजदूरों की जान
कहा जाता है कि उस प्रदर्शन में कई मजदूरों की जान भी चली गई थी. बता दें, इस पूरे घटनाक्रम को ‘हेमार्केट अफेयर’ का नाम दिया गया. इस आंदोलन के बाद 1 मई को मजदूर दिवस के रूप में इसलिए मनाया जाने लगा ताकि ‘हेमार्केट अफेयर’ आंदोलन में जान गवाने वाले मजदूरों को श्रद्धांजलि दी जा सके, लेकिन क्या मजदूर दिवस केवल मजदूरों को श्रद्धांजलि देने के लिए मनाया जाना चाहिए. उन मजदूरों की जिंदगी सिर्फ श्रद्धांजलि तक ही सीमित है, क्या उस हादसे के बाद मजदूरों के हालातों में कुछ सुधार आया?

क्या वाकई होती है मजदूरों के अधिकारों की बात
अगर हम मौजूदा समय की बात करें तो क्या वाकई आज मजदूरों के अधिकारों की बात की जाती है, क्या वाकई मजदूरों को उनकी मेहनत का उचित वेतन मिल पाता है. क्या उनकी सेफ्टी का ध्यान रखा जाता है. क्या उन्हें हेल्थ इंश्योरेंस दिया जाता है. क्या उन्हें भी कोई हादसा होने पर मुआवजा दिया जाता. अगर कहानी किस्सों से निकलकर हकीकत की ओर ध्यान दिया जाए तो इसका जवाब है ‘नहीं’. भारत में मजदूरों को आज भी पिछड़ी नजर से देखा जाता है.

भारत में मजदूर की मौत होना आम बात?
अगर किसी मजदूर की कंपनी में ड्यूटी के दौरान मौत हो जाती है तो उसकी खबर कहीं दिखाई नहीं पड़ती है जबकि किसी नेता, अभिनेता या किसी सोशल मीडिया इंफ्लुएंसर की मौत हो जाती है तो एक या दो दिन नहीं, बल्कि कई दिनों तक न्यूज चैनल्स पर उनकी खबरें चलाई जाती हैं. उनके लिए सोशल मीडिया पर हैशटैग चलाए जाते हैं. उन्हें न्याय दिलाने के लिए सोशल मीडिया पर वॉर छिड़ जाती है, जबकि एक मजदूर की जान जाने पर ये लोग मौन हो जाते हैं. ना कोई मीडिया कवरेज होती है, ना कोई हैश टैग चलाया जाता है, ना कोई कैंडल मार्च निकाला जाता है और ना किसी राष्ट्रीय शोक का ऐलान किया जाता है, बल्कि मजदूर की मौत सरकार और मीडिया के लिए एक आंकड़ा बनकर रह जाती है.

मजदूर की मौत होने पर नेता और मंत्री क्या करते हैं?
अगर किसी मॉल, रेस्टोरेंट, 5 स्टार होटल, अस्पताल, सरकारी दफ्तर या हवाई यात्रा के दौरान कोई हादसा हो जाता है और किसी की मौत हो जाए तो तुरंत सरकार की ओर से उन लोगों को मुआवजा देने का ऐलान किया जाता है. बड़े-बड़े नेताओं और जाने-माने लोगों का घटनास्थल पर पहुंचने की सिलसिला शुरू हो जाता है, लेकिन किसी मजदूर की मौत होने पर उसके परिवार के लिए किसी मुआवजे का ऐलान नहीं किया जाता है, जबकि सही मायने में उस मुआवजे की सबसे ज्यादा जरूरत उस मजदूर के परिवार को होती है, लेकिन उस वक्त सरकार का बैंक खाता खाली हो जाता है. उन नेता और मंत्रियों के पास मृतक मजदूर के परिवार से मिलने का समय तक नहीं होता है.

वहीं, TRP की रेस में भाग रहे न्यूज चैनल्स भी किसी मजदूर की मौत की खबर को सुपरफास्ट बुलेटिन का हिस्सा बनाकर छोड़ देते हैं. कारण बस इतना है कि वो मजदूर है और उससे पहले वो गरीब है. वो उस वर्ग का हिस्सा है जिसे आज भी हमारे समाज में पैसे के आधार पर पिछड़ा माना जाता है, लेकिन सत्ता में बैठे नेता और सोशल मीडिया पर हैशटैग चलाने वाले लोग ये भूल जाते हैं कि उसी मजदूर की मेहनत के कारण उनके घरों में कई सामान पहुंच रहे हैं, लोग भूल जाते हैं कि जिन बड़ी-बड़ी इमारतों में बैठकर वो काम करते हैं वो इमारतें भी ये मजदूर ही बनाते हैं.

मंत्री और नेता भी ये भूल जाते हैं कि जिस भारत की अर्थव्यस्था को आगे ले जाने की वो बात करते हैं उसमें इन मजदूरों की भी अहम भूमिका होती है, लेकिन जब इनके अधिकारों की बात आती है तो सरकार में बैठे सत्ताधारी भी मौन हो जाते हैं. अगर हम बड़ी कंपनियों के नाम हटाकर छोटी कंपनियों की बात करें तो मजदूरों को उन छोटे कारखानों ना तो अच्छा वेतन मिलता है और ना कोई स्वास्थ्य सुविधा. सुरक्षा की बात की जाए तो ना की जाए वही बेहतर है, क्योंकि मजदूरों की सुरक्षा इनके लिए कोई मायने नहीं रखती है.

अंतर्राष्ट्रीय श्रम संगठन ने खुद एक स्टेटमेंट देते हुए कहा कि भारत में मजदूरों के हालात बहुत खराब है. यहां एक लाख मजदूरों में से 100 से ज्यादा की ड्यूटी के दौरान मौत हो जाती है. अगर आंकडे देखे जाएं तो भारत में सबसे ज्यादा हादसे कैमिकल कंपनी में होते हैं, जिसका कारण सुरक्षा अव्यवस्था होती है, और ऐसा नहीं है कि इन कंपनियों के लिए कोई नियम कानून नहीं हैं. भारत में एक कैमिकल कंपनी चलाने के लिए करीब 15 कानून, 19 नियमवलियां और कई सेफ्टी गाइडलाइंस हैं, लेकिन वो नियम, कानून और गाइडलाइन सिर्फ कागजों तक ही सीमित हैं, क्योंकि इसके लिए बोलने वालों की बोलती पैसे ने बंद कर दी है. और अगर कोई मजदूर इसके लिए आवाज उठाना भी चाहे तो उसे ये कहकर चुप करा दिया जाता है कि ‘तुम शांत होकर अपना काम करो और नहीं करना तो नौकरी छोड़कर जाओं’. और फिर क्या उस व्यक्ति को अपना घर चलाने के लिए इन सभी चीजों से समझौता करना पड़ता है.

वहीं मजदूरों के लिए कानून की बात की जाए तो उसकी हकीकत भी बहुत अच्छी नहीं है. आए दिन लेबर कोर्ट में मजदूरों के नए मामले पहुंचते हैं, लेकिन काला कोर्ट पहनकर न्याय दिलाने की बात करने वाले भी तारीखों पे तारीख देकर उन गरीब मजदूरों से तब तक पैसा ऐंठते हैं जब तक उन्हें कोई नया ग्राहक ना मिल जाए.

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